गुरुवार, 5 मार्च 2026

आलस्य एक रोग लाइलाज


आलस्य : मनुष्य का सबसे सभ्य शत्रु

*** अजामिल

साहित्यकार पत्रकार


 जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे ज़्यादा मारता है

मानव इतिहास के पन्ने पलटिए—आपको युद्ध मिलेंगे, महामारियाँ मिलेंगी, प्राकृतिक आपदाएँ मिलेंगी। लेकिन यदि आप ध्यान से देखें तो पाएँगे कि मनुष्य को सबसे ज़्यादा नुकसान किसी बाहरी शत्रु ने नहीं, बल्कि एक अदृश्य प्रवृत्ति ने पहुँचाया है—आलस्य।

आलस्य कोई शोर नहीं करता, कोई घोषणा नहीं करता। वह न तो तलवार उठाता है, न बम गिराता है। वह बस धीरे-धीरे मनुष्य की इच्छाशक्ति को कमजोर करता है। वह सपनों को टालता है, संकल्पों को स्थगित करता है और अंततः जीवन को “कभी बाद में” की फाइल में डाल देता है।

कहा जाता है कि यदि मनुष्य ने जितना सोचा, उतना कर लिया होता, तो दुनिया आज से कहीं अधिक विकसित होती। लेकिन प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य कम क्यों कर पाया, प्रश्न यह है कि वह करना शुरू ही क्यों नहीं कर पाया?

इस प्रश्न का उत्तर लगभग हर बार एक ही मिलता है—कल करेंगे।

आलस्य क्या है? केवल सुस्ती नहीं, एक मानसिक पलायन

आलस्य को सामान्यतः हम शरीर की थकान से जोड़ देते हैं, जबकि यह उसका सबसे सरल और भ्रामक रूप है।

वास्तविक आलस्य वहाँ शुरू होता है जहाँ—

काम स्पष्ट है

ज़िम्मेदारी तय है

समय उपलब्ध है

फिर भी मन टालता है

आलस्य वह क्षण है जब मनुष्य अपने ही विवेक से समझौता कर लेता है।

यह थकान नहीं, यह निर्णय से बचने की आदत है।

यहीं से आलस्य एक व्यक्तिगत कमजोरी नहीं रहता, बल्कि चरित्र का संकट बन जाता है।

आलस्य और समय : सबसे खतरनाक गठजोड़

समय संसार की एकमात्र ऐसी संपत्ति है जो न उधार मिलती है, न लौटाई जा सकती है।

आलस्य इसी समय पर पहला वार करता है।

मनुष्य समय को तीन हिस्सों में बाँट देता है—

बीता हुआ (जिस पर पछतावा),

आने वाला (जिस पर उम्मीद),

और वर्तमान (जिससे वह बचता है)।

आलस्य वर्तमान से पलायन की कला है।

इसी संदर्भ में संत कबीर दास का यह दोहा केवल साहित्य नहीं, चेतावनी बन जाता है—

काल करें तो आज कर, आज करे तो अब,

पल में प्रलय होयगी, बहुरि करोगे कब?

यह दोहा किसी काम की सूची नहीं देता,

यह मृत्यु-बोध देता है।

यह याद दिलाता है कि समय केवल बीतता नहीं—छिनता भी है।

आराम और आलस्य : एक ज़रूरी भेद

यहाँ एक मूलभूत भ्रम को तोड़ना आवश्यक है।

हर काम न करना आलस्य नहीं होता।

आराम शरीर की आवश्यकता है

आलस्य मन का बहाना

आराम काम के बाद आता है ताकि ऊर्जा लौटे।

आलस्य काम से पहले आता है ताकि निर्णय टल जाए।

जो समाज इस अंतर को नहीं समझता, वहाँ धीरे-धीरे जड़ता घर कर लेती है।

वहाँ लोग थके नहीं होते, बस उत्साहहीन हो जाते हैं।

इतिहास की दृष्टि में आलस्य

दुनिया के जिन समाजों ने प्रगति की, वहाँ केवल संसाधन नहीं थे—वहाँ मानसिक अनुशासन था।

वहाँ लोगों ने यह सीखा कि—

इच्छा कब ज़रूरत है

और कब आलस्य बन जाती है

इसके विपरीत, जिन समाजों ने हर असफलता का दोष परिस्थितियों पर डाला, वहाँ आलस्य ने खुद को संस्कृति बना लिया।

इतिहास गवाह है—

सभ्यताएँ बाहर से नहीं, अंदर से ढहती हैं।

और अंदर का सबसे पहला क्षरण आलस्य से शुरू होता है।

आधुनिक मनुष्य और सुविधाजनक आलस्य

आज का मनुष्य पहले से कहीं अधिक व्यस्त दिखता है, लेकिन उतना ही टालने वाला भी है।

तकनीक ने समय बचाया, पर साथ ही आलस्य को वैध कारण भी दे दिए—

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अभी मूड नहीं है

यह नया आलस्य न सुस्त दिखता है, न खाली।

यह व्यस्त दिखता है, पर अनुत्पादक होता है।

यह वह आलस्य है जो अपराधबोध भी नहीं होने देता, क्योंकि हर टालने के पास एक “वैध बहाना” होता है।

आलस्य के दुष्परिणाम : व्यक्ति से समाज तक

1. आत्मविश्वास का क्षरण

जो व्यक्ति बार-बार अपने ही निर्णय टालता है, वह धीरे-धीरे स्वयं पर विश्वास खो देता है।

2. मानसिक बोझ

अधूरे काम मन में बोझ बनते हैं। यह बोझ तनाव, चिंता और कुंठा को जन्म देता है।

3. स्वास्थ्य पर प्रभाव

निष्क्रिय जीवनशैली मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग जैसी समस्याओं का आधार बनती है।

4. सामाजिक जड़ता

जब बड़ी संख्या में लोग आलस्य को स्वभाव मान लेते हैं, तब समाज में नवाचार रुक जाता है।

क्या आलस्य जन्मजात है?

यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

आलस्य कोई जन्मजात दोष नहीं, बल्कि अक्सर—

असफलता का डर

आलोचना की आशंका

आत्म-संदेह

और जीवन के अर्थ का अभाव

का परिणाम होता है।

जब मनुष्य को अपने काम का अर्थ नहीं दिखता, तब वह उससे बचने लगता है।

इसलिए आलस्य से लड़ाई केवल समय-सारिणी से नहीं, दृष्टि परिवर्तन से जीती जाती है।

आलस्य से मुक्ति : कोई त्वरित समाधान नहीं

आलस्य वर्षों में बनता है, वह एक दिन में नहीं टूटता।

लेकिन यह असंभव भी नहीं।

छोटे कदम

बड़े लक्ष्य आलस्य को बढ़ाते हैं। छोटे, स्पष्ट कार्य उसे तोड़ते हैं।

अनुशासन

प्रेरणा आती-जाती है, अनुशासन ठहरता है।

स्व-प्रश्न

हर टालने के क्षण में स्वयं से पूछना चाहिए—

मैं थका हूँ या डर रहा हूँ?

समय का सम्मान

जो समय का सम्मान नहीं करता, समय भी उसे गंभीरता से नहीं लेता।

निष्कर्ष : आलस्य से मुक्ति, आत्मसम्मान की पुनर्प्राप्ति

आलस्य कोई साधारण आदत नहीं।

यह आत्मसम्मान का क्षरण है।

जब मनुष्य अपने ही निर्णयों को टालने लगता है, तब वह धीरे-धीरे अपने जीवन से समझौता करने लगता है।

यह आलेख किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है।

क्योंकि अंततः प्रश्न यही है—

यदि आज नहीं, तो कब?

और यदि मनुष्य ने इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर ढूँढ लिया,

तो आलस्य हार जाएगा—

बिना किसी शोर के।

**अजामिल





बुधवार, 4 मार्च 2026

समोसा एक राष्ट्रीय व्यंजन/अजामिल

भारतीय स्वादिस्ट व्यंजनों की चर्चा समोसे के जिक्र के बिना अधूरी मानी जायेगी। भारतीय समोसा एक मात्र ऐसा व्यंजन है, जो सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी स्वाद के शौकीनों के बीच लोकप्रियता के शिखर पर है। भारत में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है, जहाँ पर लोग समोसा न खाते हों। ये अलग बात है, कि समोसे को कई-कई जगहों पर कई-कई नामों से जाना जाता है, लेकिन कुल मिलाकर होता वह समोसा ही है। पिज्जा और बर्गर भले ही बाजार में ऊँची कीमतों वाले व्यंजन हों, लेकिन समोसे की लोकप्रियता के आगे वो टिक नहीं पाते। इडली और डोसा भी काफी पॉपुलर हैं, लेकिन इनके प्रतिदिन उपयोग करने वालों की संख्या आज भी कम है। चाऊमिन भी अपने लच्छेदार व्यक्तित्व के होने के बावजूद समोसे से आगे नहीं निकल पाता। छोले-भटूरे भी गरिष्ठ व्यंजन पसंद करने वाले लोगों को रास आते हैं, लेकिन समोसे के आगे इनकी भी नहीं चलती।


भारतीय औसतन दो करोड़ रूपये से ज्यादा के समोसे प्रतिदिन खा जाते हैं। अनुभवियों का मानना है, कि पहला समोसा स्वाद के लिए होता है, दूसरा मन को अच्छा लगता है, और तीसरा, चौथा खा लेने पर तो भूख मिट जाती है या मर जाती है। जो लोग ज्यादातर घर से बाहर रह कर काम में व्यस्त रहते हैं, समोसा भारत में ऐसे लोगों के लिए कम से कम एक वक्त के भोजन का विकल्प बना हुआ है। विदेशों में समोसा फास्ट फूड की फेहरिस्त में शामिल है, लेकिन भारत में स्टफ्ड डीप फ्राई समोसा किसी भी वक्त लोग खा सकते हैं।


मजेदार बात यह है, कि भारत में समोसे की डिजाइन को लेकर कोई बड़ा परिवर्तन कभी नही हुआ। वही त्रिकोणीय आकृति, वही नोंकदार कोने और समोसे के पेट में भरा हुआ मसालेदार सोंधा-सोंघा आलू। समोसे बनाने की कला में भारत में किसी भी तरह के शोध का स्वागत कभी नहीं किया गया। समोसा एक ऐसा व्यंजन है, जिसे देखते ही स्वाद के शौकीनों के मुँह में रासायनिक प्रतिक्रिया होने लगती है। समोसा खाने का लालच पैदा करता है, समोसा लोगों को अपना दीवाना बना देता है।


बहुत कम लोगों को मालूम होगा, कि पृथ्वी पर समोसा एक हजार साल पहले अवतरित हुआ था। दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में समोसा पहली बार अस्तित्व में आया। तेरहवीं, चौदहवीं शताब्दी में बाहर से आने वाले व्यापारी स्वादिष्ट समोसों की पहली खेप लेकर भारत आये। उनके समोसे डिजाइन को लेकर बहुत आकर्षक नहीं थे, लेकिन पुराने दस्तावेज बताते हैं, कि उनका स्वाद गजब का था। दिल्ली सल्तनत के विद्वान महाकवि अमीर खुसरो ने अपनी एक रचना में समोसे का जिक्र किया है, लेकिन उस समोसे में आलू की जगह कीमा (मीट) भरे होने की बात कही गयी है। देशी-घी में बना डीप फ्राई समोसा उस दौर के शाही परिवारों के स्वाद में शामिल था। चौदहवीं शताब्दी में इब्नेबतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा है, कि मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में भोजन के दौरान जो समोसा परोसा गया था, उसमें मूँगफली और बादाम भरा गया था। सोलहवीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज आईने अकबरी में समोसे का जिक्र आता है। इन बातों से साबित होता है, कि समोसा आज के तमाम दूसरे लोकप्रिय व्यंजनों के बीच सीनियारिटी में नम्बर वन पर है।


ताज्जुब यह होता है, कि पूरी दुनिया में समोसे के लाखों-लाख मुरीद होने के बावजूद समोसे को बनाने की कला में उतने प्रयोग नहीं हुए, जितने समोसे के साथ परोसे जाने वाली चटनी को लेकर हुए। चटनी समोसे की बेस्ट फ्रेंड है। समोसा अपना रंग तभी खुलकर दिखा पाता है, जब चटनी भी साथ हो। समोसा चटनी आश्रित व्यंजन है। समोसे पर भी बाजार का दबाव पड़ रहा है। फास्ट फूड बनाने वाली देशी-विदेशी कम्पनियों की नजर समोसे पर भी टिकी हुयीं हैं। अभी तक किसी ने समोसे को पेटेण्ट तो नहीं कराया, लेकिन यह गोल्डेन ट्रॅगल अगर फ्रोजन फूड के रूप में किसी कम्पनी ने बाजार में लाँच कर दिया, तो समोसे की तो चाँदी हो जायेगी। हालाँकि कुछ जगहों पर समोसा बेक करके भी खाया जा रहा है। इलाहाबाद में तमाम मोहल्लों में कई पॉपुलर समोसा प्वाइंट बने हुए हैं। लोकनाथ पर मिलने वाला हरी का समोसा देश-विदेश में लोकप्रिय है। इसकी खास बात यह है, कि यह समोसा तीन महीने तक नमी से बचाकर रखे जाने पर स्वादिष्ट और ताजा बना रहता है। खुल्दाबाद में भी एक समोसा प्वाइंट है, जहाँ से लगभग पाँच हजार समोसे प्रतिदिन बिकते हैं। ग्राहकों की कतार समोसे के कढ़ाई से निकलने का इंतजार करते इन दुकानों पर देखी जा सकती है। बढ़िया बात यह है, कि छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा खाने-पीने की चीजें बेचने वाला दुकानदार समोसे को इग्नोर नहीं कर पाता।


समोसे की लोकप्रियता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है, कि हिन्दी फिल्म का एक गाना जब तक रहेगा समोसे में आलू, तेरा रहूँगा ओ मेरी शालू' समोसे के कारण ही प्रसिद्ध हो गया। बहरहाल शालू रहे या न रहे, समोस के साथ आलू का गठबंधन हमेशा रहेगा, यह यू०पी०ए० की सरकार थोड़ी है, जहाँ गठबंधन हमेंशा संकट में रहता है।

**अजामिल