भारतीय स्वादिस्ट व्यंजनों की चर्चा समोसे के जिक्र के बिना अधूरी मानी जायेगी। भारतीय समोसा एक मात्र ऐसा व्यंजन है, जो सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी स्वाद के शौकीनों के बीच लोकप्रियता के शिखर पर है। भारत में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है, जहाँ पर लोग समोसा न खाते हों। ये अलग बात है, कि समोसे को कई-कई जगहों पर कई-कई नामों से जाना जाता है, लेकिन कुल मिलाकर होता वह समोसा ही है। पिज्जा और बर्गर भले ही बाजार में ऊँची कीमतों वाले व्यंजन हों, लेकिन समोसे की लोकप्रियता के आगे वो टिक नहीं पाते। इडली और डोसा भी काफी पॉपुलर हैं, लेकिन इनके प्रतिदिन उपयोग करने वालों की संख्या आज भी कम है। चाऊमिन भी अपने लच्छेदार व्यक्तित्व के होने के बावजूद समोसे से आगे नहीं निकल पाता। छोले-भटूरे भी गरिष्ठ व्यंजन पसंद करने वाले लोगों को रास आते हैं, लेकिन समोसे के आगे इनकी भी नहीं चलती।
भारतीय औसतन दो करोड़ रूपये से ज्यादा के समोसे प्रतिदिन खा जाते हैं। अनुभवियों का मानना है, कि पहला समोसा स्वाद के लिए होता है, दूसरा मन को अच्छा लगता है, और तीसरा, चौथा खा लेने पर तो भूख मिट जाती है या मर जाती है। जो लोग ज्यादातर घर से बाहर रह कर काम में व्यस्त रहते हैं, समोसा भारत में ऐसे लोगों के लिए कम से कम एक वक्त के भोजन का विकल्प बना हुआ है। विदेशों में समोसा फास्ट फूड की फेहरिस्त में शामिल है, लेकिन भारत में स्टफ्ड डीप फ्राई समोसा किसी भी वक्त लोग खा सकते हैं।
मजेदार बात यह है, कि भारत में समोसे की डिजाइन को लेकर कोई बड़ा परिवर्तन कभी नही हुआ। वही त्रिकोणीय आकृति, वही नोंकदार कोने और समोसे के पेट में भरा हुआ मसालेदार सोंधा-सोंघा आलू। समोसे बनाने की कला में भारत में किसी भी तरह के शोध का स्वागत कभी नहीं किया गया। समोसा एक ऐसा व्यंजन है, जिसे देखते ही स्वाद के शौकीनों के मुँह में रासायनिक प्रतिक्रिया होने लगती है। समोसा खाने का लालच पैदा करता है, समोसा लोगों को अपना दीवाना बना देता है।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा, कि पृथ्वी पर समोसा एक हजार साल पहले अवतरित हुआ था। दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में समोसा पहली बार अस्तित्व में आया। तेरहवीं, चौदहवीं शताब्दी में बाहर से आने वाले व्यापारी स्वादिष्ट समोसों की पहली खेप लेकर भारत आये। उनके समोसे डिजाइन को लेकर बहुत आकर्षक नहीं थे, लेकिन पुराने दस्तावेज बताते हैं, कि उनका स्वाद गजब का था। दिल्ली सल्तनत के विद्वान महाकवि अमीर खुसरो ने अपनी एक रचना में समोसे का जिक्र किया है, लेकिन उस समोसे में आलू की जगह कीमा (मीट) भरे होने की बात कही गयी है। देशी-घी में बना डीप फ्राई समोसा उस दौर के शाही परिवारों के स्वाद में शामिल था। चौदहवीं शताब्दी में इब्नेबतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा है, कि मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में भोजन के दौरान जो समोसा परोसा गया था, उसमें मूँगफली और बादाम भरा गया था। सोलहवीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज आईने अकबरी में समोसे का जिक्र आता है। इन बातों से साबित होता है, कि समोसा आज के तमाम दूसरे लोकप्रिय व्यंजनों के बीच सीनियारिटी में नम्बर वन पर है।
ताज्जुब यह होता है, कि पूरी दुनिया में समोसे के लाखों-लाख मुरीद होने के बावजूद समोसे को बनाने की कला में उतने प्रयोग नहीं हुए, जितने समोसे के साथ परोसे जाने वाली चटनी को लेकर हुए। चटनी समोसे की बेस्ट फ्रेंड है। समोसा अपना रंग तभी खुलकर दिखा पाता है, जब चटनी भी साथ हो। समोसा चटनी आश्रित व्यंजन है। समोसे पर भी बाजार का दबाव पड़ रहा है। फास्ट फूड बनाने वाली देशी-विदेशी कम्पनियों की नजर समोसे पर भी टिकी हुयीं हैं। अभी तक किसी ने समोसे को पेटेण्ट तो नहीं कराया, लेकिन यह गोल्डेन ट्रॅगल अगर फ्रोजन फूड के रूप में किसी कम्पनी ने बाजार में लाँच कर दिया, तो समोसे की तो चाँदी हो जायेगी। हालाँकि कुछ जगहों पर समोसा बेक करके भी खाया जा रहा है। इलाहाबाद में तमाम मोहल्लों में कई पॉपुलर समोसा प्वाइंट बने हुए हैं। लोकनाथ पर मिलने वाला हरी का समोसा देश-विदेश में लोकप्रिय है। इसकी खास बात यह है, कि यह समोसा तीन महीने तक नमी से बचाकर रखे जाने पर स्वादिष्ट और ताजा बना रहता है। खुल्दाबाद में भी एक समोसा प्वाइंट है, जहाँ से लगभग पाँच हजार समोसे प्रतिदिन बिकते हैं। ग्राहकों की कतार समोसे के कढ़ाई से निकलने का इंतजार करते इन दुकानों पर देखी जा सकती है। बढ़िया बात यह है, कि छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा खाने-पीने की चीजें बेचने वाला दुकानदार समोसे को इग्नोर नहीं कर पाता।
समोसे की लोकप्रियता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है, कि हिन्दी फिल्म का एक गाना जब तक रहेगा समोसे में आलू, तेरा रहूँगा ओ मेरी शालू' समोसे के कारण ही प्रसिद्ध हो गया। बहरहाल शालू रहे या न रहे, समोस के साथ आलू का गठबंधन हमेशा रहेगा, यह यू०पी०ए० की सरकार थोड़ी है, जहाँ गठबंधन हमेंशा संकट में रहता है।
**अजामिल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें